बड़ी खबर
सुप्रीम कोर्ट ने तय किया: डिजिटल भुगतान पर “मूल” रसीद की माँग अवैध
परिचय
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 12 अक्टूबर 2026 को एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया, जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि जब किसी टेंडर के लिए बिड सुरक्षा ऑनलाइन इलेक्ट्रॉनिक भुगतान गेटवे के माध्यम से जमा की जाती है, तो उस रसीद की “मूल” भौतिक प्रति की माँग करना असंगत और असंभव है। यह निर्णय रेलवे मंत्रालय द्वारा जारी “इंजीनियरिंग प्रोक्योरमेंट और कंस्ट्रक्शन (ईपीसी)” टेंडर के संदर्भ में हार्डेव कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड के पक्ष में आया।
मुख्य घटनाक्रम
- टेंडर का आरम्भ
रेलवे मंत्रालय ने 6 जनवरी 2026 को “बिक्रमशिला‑कटारेह नई लाइन रेल लिंक प्रोजेक्ट” के तहत गाइड बंड, लॉन्चिंग अपॉर्न और नदी संरक्षण कार्यों के निर्माण हेतु ईपीसी टेंडर जारी किया। - हार्डेव कंस्ट्रक्शन का प्रस्ताव
हार्डेव कंस्ट्रक्शन ने अपनी बिड जमा करते समय बिड सुरक्षा के रूप में इलेक्ट्रॉनिक भुगतान गेटवे के माध्यम से राशि जमा की और डिजिटल रसीद को ई‑प्रोक्योरमेंट पोर्टल पर अपलोड किया। - टेक्निकल अस्वीकृति
टेंडर प्राधिकरण ने तकनीकी चरण में बिड अस्वीकृत कर दी, कारण: “बिड सुरक्षा की भौतिक मूल रसीद प्रस्तुत नहीं की गई” (धारा 2.20.6(ii) के अनुसार)। - उच्च न्यायालय का निर्णय
पटन हाई कोर्ट ने अपील को खारिज कर दिया, हार्डेव कंस्ट्रक्शन की अस्वीकृति को मान्य किया। - सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस जेड बी. पर्डीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन के बेंच पर इस मामले पर विचार किया और पटन हाई कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया।
महत्वपूर्ण जानकारी
- बिड सुरक्षा के वैकल्पिक रूप
टेंडर दस्तावेज़ में बिड सुरक्षा के निम्नलिखित रूप स्वीकार्य थे: - बैंक गारंटी
- डिमांड ड्राफ्ट
- फिक्स्ड डिपॉज़िट रसीद
- बैंकर का चेक
- इलेक्ट्रॉनिक भुगतान गेटवे
- धारा 2.20.6(ii) की व्याख्या
इस धारा के अनुसार, “जिस रूप में बिड सुरक्षा प्रस्तुत की गई है, उसे भौतिक रूप से नामित अधिकारी को सौंपना आवश्यक है।” - इलेक्ट्रॉनिक भुगतान के लिए “मूल” रसीद की आवश्यकता नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इलेक्ट्रॉनिक भुगतान के मामले में, धन सीधे प्राधिकरण के खाते में जमा हो जाता है, अतः भौतिक रसीद की आवश्यकता नहीं होती।
संबंधित बयान
- हार्डेव कंस्ट्रक्शन के वकील
“हमने बिड सुरक्षा सीधे प्राधिकरण के खाते में जमा की और डिजिटल रसीद को पोर्टल पर अपलोड किया। इसलिए, भौतिक रसीद की माँग असंगत है।” - रेलवे मंत्रालय के वकील
“धारा 2.20.6(ii) स्पष्ट रूप से भौतिक मूल रसीद की माँग करती है, इसलिए अस्वीकृति उचित है।” - सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस
“इलेक्ट्रॉनिक भुगतान के मामले में, धन पहले ही प्राधिकरण के खाते में पहुँच चुका है। भौतिक रसीद की माँग करना असंभव और परभ्रमात्मक है।”
प्रभाव और संदर्भ
- टेंडर प्रक्रिया में पारदर्शिता
यह निर्णय टेंडर दस्तावेज़ों में स्पष्टता और व्यावहारिकता के बीच संतुलन स्थापित करता है। - इलेक्ट्रॉनिक भुगतान का प्रोत्साहन
अब कंपनियाँ इलेक्ट्रॉनिक भुगतान को अपनाने के लिए अधिक प्रोत्साहित होंगी, क्योंकि भौतिक रसीद की बाधा हट गई है। - कानूनी पूर्वधारणा
यह मामला “प्रकाश एसेटिकिंग्स एंड टोल हाईवे (इंडिया) लिमिटेड बनाम मन्दीप एंटरप्राइज़ेज” के निर्णय से अलग है, जहाँ टेंडर शर्तों की व्याख्या पर अलग दृष्टिकोण अपनाया गया था। - सार्वजनिक हित
हार्डेव कंस्ट्रक्शन की बिड राशि अन्य प्रतिस्पर्धियों से कम थी, जिससे सार्वजनिक कोष पर संभावित लाभ हो सकता है।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय टेंडरिंग प्रक्रियाओं में डिजिटल भुगतान के उपयोग को वैध और स्वीकार्य बनाता है। भौतिक रसीद की अनावश्यक माँग को समाप्त करके, यह निर्णय न केवल कंपनियों के लिए सुविधा पैदा करता है, बल्कि सार्वजनिक प्राधिकरणों की कार्यक्षमता और पारदर्शिता को भी बढ़ाता है। भविष्य में इसी प्रकार के टेंडर मामलों में इलेक्ट्रॉनिक भुगतान को मानक रूप से स्वीकार किया जाएगा, जिससे भारत के सार्वजनिक क्षेत्र में दक्षता और प्रतिस्पर्धा दोनों को बढ़ावा मिलेगा।
