शीर्षक
तुलबुल नौवहन परियोजना: कश्मीर के लिए नई उम्मीद
परिचय
कश्मीर के जेम्ल नदी पर चल रही तुलबुल नौवहन परियोजना को सरकार ने फिर से सक्रिय करने का निर्णय लिया है। 1984 में आरम्भ हुई यह परियोजना, जो जेम्ल के प्रवाह को नियंत्रित कर सर्दियों में नौवहन योग्य बनाने हेतु थी, 1987‑1989 में पाकिस्तान की आपत्तियों के कारण ठप हो गई थी। 2025 में पाहरगम में हुए आतंकवादी हमलों के बाद भारत ने सिंधु जल संधि को निलंबित कर दिया, जिससे इस परियोजना को पुनर्जीवित करने का मार्ग खुला है।
मुख्य घटनाक्रम
– आरम्भ और अवरोध – 1984 में तुलबुल नौवहन परियोजना शुरू हुई, जिसका उद्देश्य जेम्ल नदी की धारा को नियंत्रित कर शीतकालीन महीनों में नौवहन सुनिश्चित करना था।
– पाकिस्तानी आपत्ति – 1987 और 1989 में पाकिस्तान ने परियोजना को सिंधु जल संधि के प्रावधानों के उल्लंघन का दावा करते हुए विरोध किया, जिसके कारण कार्य रुक गया।
– संधि का निलंबन – 2025 में पाहरगम में हुए आतंकवादी हमलों के बाद भारत ने सिंधु जल संधि को निलंबित कर दिया, जिससे कश्मीर के जल संसाधनों पर नियंत्रण पुनः प्राप्त हुआ।
– सरकारी पहल – निलंबन के बाद, सरकार ने जेम्ल, चेनाब और सिंधु की पश्चिमी नदियों के जल को पाकिस्तान को आवंटित करने के साथ-साथ रवि, बीस और सटलुज की पूर्वी नदियों के जल को कश्मीरी जनता के लिए उपलब्ध कराने की योजना बनाई।
महत्वपूर्ण जानकारी
– वुलर झील का महत्व – वुलर झील जेम्ल, माधुमति नाला, अरिन पोहेन, निंगली आदि से बहाव प्राप्त करती है, परंतु इसका केवल एक ही निकास है – जेम्ल नदी। पाकिस्तान का दावा है कि यह झील जेम्ल का मुख्य हिस्सा है, जबकि भारत का कहना है कि परियोजना केवल झील की प्राकृतिक भंडारण क्षमता का उपयोग कर नौवहन को बढ़ावा देती है।
– संधि के प्रावधान – सिंधु जल संधि 1960 में हस्ताक्षरित हुई थी, परंतु तब के समय जलवायु परिवर्तन, नदी की सफ़ाई आदि पर कोई विचार नहीं था। निलंबन के बाद इस संधि को पुनः मूल्यांकन करने का अवसर मिला है।
– कश्मीर के जल अधिकार – कश्मीर की ऊँचाईयों से निकलने वाली नदियाँ और उनकी सहायक नदियाँ कश्मीर की आर्थिक और सामाजिक संरचना के लिए अनिवार्य हैं। वर्तमान में कश्मीरी जनता को इन जल संसाधनों का सीमित ही अधिकार प्राप्त है।
संबंधित बयान
– पूर्व सिंधु जल संधि आयुक्त पीके सक्सेना ने कहा, “वुलर झील के बहु-प्रवाह और एकमात्र निकास के कारण यह परियोजना नौवहन के लिए उपयुक्त है। यह ‘गैर‑उपभोगी उपयोग’ के अंतर्गत आती है, जिसे संधि के तहत अनुमति है।”
– सरकार के वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, “संधि के निलंबन के बाद हम कश्मीर को जल संसाधनों का उचित हिस्सा देने के लिए प्रतिबद्ध हैं। इससे स्थानीय किसानों और व्यापारियों को नई आर्थिक संभावनाएँ मिलेंगी।”
प्रभाव
1. आर्थिक विकास – तुलबुल नौवहन परियोजना से जेम्ल के साथ-साथ वुलर झील के जलमार्ग पर माल ढुलाई संभव होगी। इससे कश्मीर के कृषि व शीतल उत्पादों की परिवहन लागत घटेगी और बाजार तक पहुँच आसान होगी।
2. सड़क जाम में कमी – नौवहन योग्य जलमार्ग से सड़क परिवहन पर दबाव कम होगा, जिससे प्रमुख शहरों में ट्रैफ़िक जाम में राहत मिलेगी।
3. हाइड्रोइलेक्ट्रिक परियोजनाएँ – जल स्तर को नियंत्रित करने से क्षेत्र में जलविद्युत परियोजनाओं के लिए उपयुक्त परिस्थितियाँ बनेंगी, जिससे ऊर्जा की कमी दूर होगी।
4. जल सुरक्षा – जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को देखते हुए, जल संसाधनों का बेहतर प्रबंधन कश्मीर की दीर्घकालिक जल सुरक्षा सुनिश्चित करेगा।
निष्कर्ष
तुलबुल नौवहन परियोजना का पुनरारंभ कश्मीर के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। निलंबित सिंधु जल संधि के बाद, कश्मीरी जनता को जल संसाधनों का उचित अधिकार मिलने से सामाजिक-आर्थिक स्थिरता में वृद्धि होगी। वुलर झील के नौवहन योग्य जलमार्ग से न केवल व्यापारिक गतिविधियाँ बढ़ेंगी, बल्कि क्षेत्रीय समृद्धि और समन्वय को भी नई दिशा मिलेगी। सरकार की यह पहल कश्मीर के भविष्य के लिए आशा की किरण है, जो जल, ऊर्जा और आर्थिक विकास के बीच संतुलन स्थापित करने में सहायक सिद्ध होगी।
