India’s Tier-2 GCC expansion runs into infrastructure, talent hurdles

वैश्विक क्षमता केंद्रों के विस्तार में टियर‑2 शहरों को सामना करना पड़ रहा है बुनियादी ढाँचे और कौशल की दोहरी चुनौतियाँ

परिचय
भारत की वैश्विक क्षमता केंद्र (वैश्विक क्षमता केंद्र) नीति के तहत टियर‑2 शहरों में विस्तार की योजनाएँ तेज़ी से आगे बढ़ रही हैं। परंतु 3AI QuantX के नवीनतम अध्ययन से पता चलता है कि उन्नत एआई और डेटा विज्ञान के पदों में 20‑25 % की कमी है, विशेषकर एमएलओप्स, एलएलएमओप्स और एजेंटिक एआई में। इस लेख में हम बुनियादी ढाँचे, कौशल की कमी और नीति के प्रभावों पर चर्चा करेंगे।

मुख्य घटनाक्रम
– कौशल अंतराल: 3AI QuantX के अनुसार, केवल 15 % से कम उपलब्ध प्रतिभा एआई जीवन‑चक्र के सभी चरणों में दक्ष है।
– भविष्य का अनुमान: 2026 तक वैश्विक क्षमता केंद्रों में 35‑40 % तक उत्पाद इंजीनियरिंग और एआई प्लेटफ़ॉर्म परियोजनाओं का नेतृत्व कर सकते हैं, जबकि 2022 में यह आंकड़ा 20‑25 % था।
– बुनियादी ढाँचे की कमी: मोना अग्रवाल, ETS के प्रबंध निदेशक, ने टियर‑2 शहरों में सड़कों, कनेक्टिविटी, आवास, आवागमन और सामाजिक सुविधाओं की कमी को प्रमुख बाधा बताया।

महत्वपूर्ण जानकारी
1. इन्फ्रास्ट्रक्चर की चुनौतियाँ
– टियर‑2 शहरों में अक्सर सड़कें, इंटरनेट कनेक्टिविटी और सार्वजनिक परिवहन की गुणवत्ता कम होती है।
– आवास, स्कूल, कॉलेज और स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता भी सीमित है, जिससे वैश्विक कंपनियों के लिए कर्मचारियों को स्थानांतरित करना कठिन हो जाता है।

  1. कौशल और प्रतिभा
  2. एमएलओप्स, एलएलएमओप्स और एजेंटिक एआई जैसे विशेष क्षेत्रों में विशेषज्ञता की गंभीर कमी है।
  3. टियर‑2 शहरों में कर्मचारियों का टर्नओवर कम हो सकता है क्योंकि आवागमन कम होता है, परंतु उन्हें मेट्रो शहरों के समान करियर प्रगति के अवसर देने की आवश्यकता है।

  4. नीति और समर्थन

  5. केंद्र सरकार का प्रस्तावित राष्ट्रीय वैश्विक क्षमता केंद्र नीति एक व्यापक ढाँचा तैयार करेगी, जिसमें एक‑विंडो अनुमोदन और डिजिटल दस्तावेज़ भंडारण की व्यवस्था शामिल है।
  6. कई राज्यों (उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, हरियाणा, तमिलनाडु) ने पहले ही अपनी स्वयं की वैश्विक क्षमता केंद्र नीतियाँ जारी कर दी हैं।

  7. विश्वविद्यालयों की भूमिका

  8. भारत में 300 से अधिक विश्वविद्यालयों ने वैश्विक क्षमता केंद्रों के साथ साझेदारी की है, जिनमें एआई, डेटा इंजीनियरिंग और उभरती प्रौद्योगिकियों पर संयुक्त कार्यक्रम चल रहे हैं।

संबंधित बयान
मोना अग्रवाल ने कहा, “टियर‑2 शहरों में बुनियादी ढाँचे की कमी वैश्विक कंपनियों के लिए सबसे बड़ा अवरोध है। सड़कें, कनेक्टिविटी और सामाजिक सुविधाएँ पहली छाप बनाती हैं।”
उन्होंने यह भी जोड़ा, “कर्मचारियों को मेट्रो शहरों के समान करियर प्रगति के अवसर देने से टर्नओवर कम होगा और प्रतिभा बनी रहेगी।”

प्रभाव और संदर्भ
भारत में वर्तमान में 2,100 से अधिक वैश्विक क्षमता केंद्र हैं, जिनमें 23 लाख से अधिक पेशेवर कार्यरत हैं। सरकार का लक्ष्य 2030 तक 5,000 केंद्र स्थापित करना है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए टियर‑2 शहरों को न केवल बुनियादी ढाँचे में सुधार करना होगा, बल्कि विशेष एआई कौशल वाले पेशेवरों की भी आवश्यकता होगी।

निष्कर्ष
टियर‑2 शहरों में वैश्विक क्षमता केंद्रों का विस्तार एक संभावित मार्ग है, परंतु इसके लिए बुनियादी ढाँचे और कौशल दोनों में सुधार अनिवार्य है। यदि सरकार और निजी क्षेत्र मिलकर एक सुदृढ़ ढाँचा तैयार करते हैं—सिंगल‑विंडो अनुमोदन, डिजिटल दस्तावेज़ भंडारण, और विश्वविद्यालयों के साथ गहरी साझेदारी—तो भारत अपने वैश्विक तकनीकी केंद्रों के मानचित्र को व्यापक बना सकता है और एआई‑चालित भविष्य के लिए तैयार हो सकता है।

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