जम्मू‑काश्मीर को पूर्ण राज्यत्व की माँग: ओमार अब्दुल्ला का प्रस्ताव
परिचय
सर्दियों के इस सत्र में जम्मू‑काश्मीर की विधान सभा ने एक ऐतिहासिक प्रस्ताव पर चर्चा की, जिसमें मुख्यमंत्री ओमार अब्दुल्ला ने भारत सरकार से तत्काल और अनिवार्य रूप से राज्यत्व की पूर्ण बहाली का अनुरोध किया। इस प्रस्ताव का उद्देश्य 2000 और 2024 में पारित पूर्ववर्ती निर्णयों पर आधारित होकर, क्षेत्र को फिर से एक स्वतंत्र राज्य के रूप में स्थापित करना है।
मुख्य घटनाक्रम
– 25 सितंबर को श्रीनगर में हुई सभा सत्र के दौरान ओमार अब्दुल्ला ने प्रस्ताव प्रस्तुत किया।
– प्रस्ताव में यह स्पष्ट किया गया कि 26 जून 2000 और 6 नवंबर 2024 के निर्णयों को न केवल मान्यता दी जाए, बल्कि उनके आधार पर पूर्ण राज्यत्व की माँग को भी आगे बढ़ाया जाए।
– मुख्यमंत्री ने सभी राजनीतिक दलों से एकजुट होकर इस प्रस्ताव को समर्थन देने का आग्रह किया, यह कहते हुए कि राज्यत्व किसी एक पक्ष की बात नहीं, बल्कि जम्मू‑काश्मीर के सम्पूर्ण लोगों का अधिकार है।
मुख्य बिंदु
1. विधायी आधार
– 2000 और 2024 के निर्णयों के बाद, ओमार ने स्पष्ट किया कि ये निर्णय अभी भी वैध हैं और इस प्रस्ताव के साथ उनका पूरक संबंध है।
2. जनभागीदारी
– चुनावों में लोगों की सक्रिय भागीदारी को स्वीकारते हुए, मुख्यमंत्री ने बताया कि चुनाव के बाद तीसरे कदम—राज्यत्व की बहाली—का इंतज़ार था।
3. सरकारी प्रतिबद्धता
– प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वादे पर ज़ोर देते हुए, ओमार ने कहा कि यह “मॉदी का वादा” है जिसे पूरा किया जाना चाहिए।
4. आंशिक राज्यत्व का अस्वीकार
– “आधा‑राज्य”, “चौथाई‑राज्य” जैसी कथित योजनाओं को नकारते हुए, मुख्यमंत्री ने पूर्ण राज्यत्व की ही माँग की।
बयान एवं तर्क
– शक्ति विकास निगम (पीडीसी): मुख्यमंत्री ने बताया कि पीडीसी पर पूर्ण नियंत्रण न होने के कारण, विकास निर्णयों में सीमाएँ हैं।
– सिकिम मेडिकल इन्स्टिट्यूट (एसकेआईएमएस): इसी तरह, एसकेआईएमएस के निर्णयों पर भी सीमाएँ हैं, जहाँ केवल बजट सहायता मिलती है पर निर्णय लेने का अधिकार नहीं।
– अन्य उदाहरण: ओमार ने वादा किया कि सभा में और भी कई मामलों पर चर्चा करेंगे, जहाँ चुनावी सरकार को पूर्ण अधिकार नहीं मिलता।
प्रभाव एवं संदर्भ
– राजनीतिक: यह प्रस्ताव जम्मू‑काश्मीर के राजनीतिक परिदृश्य में एक नया मोड़ ला सकता है, क्योंकि यह राज्यत्व को केंद्रीय सरकार के साथ पुनः बातचीत का विषय बनाता है।
– सामाजिक: नागरिकों के बीच आशा और असंतोष दोनों की भावनाएँ बढ़ रही हैं, क्योंकि कई लोग पूर्ण राज्यत्व की प्रतीक्षा में हैं।
– आर्थिक: राज्यत्व की बहाली से विकास परियोजनाओं पर सीधे नियंत्रण मिलने की संभावना है, जिससे क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
निष्कर्ष
ओमार अब्दुल्ला के प्रस्ताव ने जम्मू‑काश्मीर के लोगों के लिए एक स्पष्ट संदेश भेजा है: राज्यत्व का अधिकार अब भी वैध है और उसे फिर से स्थापित किया जाना चाहिए। यह पहल न केवल संविधानिक दायित्वों को याद दिलाती है, बल्कि क्षेत्र के भविष्य के लिए एक नई दिशा भी सुझाती है। यदि भारत सरकार इस प्रस्ताव को गंभीरता से लेती है, तो यह जम्मू‑काश्मीर के लिए एक नई शुरुआत का संकेत हो सकता है।
