स्मार्ट चिकित्सा उपकरणों के पुनःउपयोग व पुनर्चक्रण हेतु तात्कालिक पुनःडिज़ाइन की आवश्यकता, अध्ययन से पता चला
परिचय
वैश्विक स्तर पर इलेक्ट्रॉनिक कचरे (इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट) की मात्रा में तेज़ी से बढ़ोतरी हो रही है। संयुक्त राष्ट्र के आँकड़ों के अनुसार, वर्तमान में विश्वभर में लगभग ६.२ करोड़ टन इलेक्ट्रॉनिक कचरा उत्पन्न हो रहा है, और अगले पाँच वर्षों में यह संख्या ८.२ करोड़ टन तक पहुँचने की संभावना है। इस संदर्भ में, एक अंतरराष्ट्रीय शोध ने बताया है कि स्मार्ट चिकित्सा उपकरणों का पुनःडिज़ाइन अत्यावश्यक है ताकि इन उपकरणों का पुनःउपयोग और पुनर्चक्रण सुगम हो सके, जिससे इलेक्ट्रॉनिक कचरे की मात्रा में उल्लेखनीय कमी लाई जा सके।
मुख्य घटनाक्रम
अध्ययन के शोधकर्ताओं ने विश्वभर के अस्पतालों, क्लीनिकों और स्वास्थ्य केंद्रों में उपयोग होने वाले स्मार्ट चिकित्सा उपकरणों – जैसे कि रिमोट मॉनिटरिंग डिवाइस, इम्प्लांटेबल सेंसर, तथा इमेजिंग मशीन – का विश्लेषण किया। उन्होंने पाया कि इन उपकरणों का अधिकांश भाग एक बार उपयोग के बाद फेंक दिया जाता है, जबकि उनमें प्रयुक्त मूल्यवान धातु, पॉलिमर और अन्य घटक पुनःप्राप्त नहीं किए जा सकते। शोध में यह भी दिखाया गया कि कई उपकरणों के अंदर के सर्किट बोर्ड और बैटरियाँ विषैले रसायन समाहित करती हैं, जो यदि सही ढंग से निपटान न किया जाए तो पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल सकती हैं।
महत्वपूर्ण तथ्य
– इलेक्ट्रॉनिक कचरे की बढ़ती मात्रा: संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, २०२३ में वैश्विक स्तर पर ६.२ करोड़ टन इलेक्ट्रॉनिक कचरा उत्पन्न हुआ, और २०२८ तक यह संख्या ८.२ करोड़ टन तक पहुँचने का अनुमान है।
– स्मार्ट चिकित्सा उपकरणों का योगदान: इन उपकरणों के उत्पादन में प्रयुक्त मूल्यवान धातु (जैसे सोना, चांदी, प्लैटिनम) और दुर्लभ पृथ्वी तत्वों की मात्रा काफी है, परन्तु इनका पुनःप्राप्ति दर केवल १० % से कम है।
– पुनःडिज़ाइन की आवश्यकता: शोध में यह स्पष्ट किया गया कि यदि उपकरणों को मॉड्यूलर ढंग से बनाया जाए, तो उनके घटकों को आसानी से अलग किया जा सकता है और उन्हें पुनःउपयोग या पुनर्चक्रण के लिए तैयार किया जा सकता है।
– विनियामक पहल: कई देशों ने इलेक्ट्रॉनिक कचरे के निपटान के लिए कड़े नियम बनाए हैं, परन्तु स्मार्ट चिकित्सा उपकरणों पर विशेष नियम अभी भी अपर्याप्त हैं।
संबंधित बयान
अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता डॉ. आर. कुमार ने कहा, “स्मार्ट चिकित्सा उपकरणों का पुनःडिज़ाइन केवल पर्यावरणीय दृष्टि से ही नहीं, बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी लाभदायक है। यदि हम इन उपकरणों के घटकों को पुनःप्राप्त कर सकें, तो उत्पादन लागत में कमी आएगी और साथ ही साथ कचरे की मात्रा भी घटेगी।”
स्वास्थ्य मंत्री ने भी इस विषय पर अपना दृष्टिकोण व्यक्त किया। उन्होंने बताया कि सरकार ने स्वास्थ्य क्षेत्र में इलेक्ट्रॉनिक कचरे के प्रबंधन के लिए नई नीति तैयार की है, जिसमें स्मार्ट उपकरणों के पुनःउपयोग और पुनर्चक्रण को प्राथमिकता दी जाएगी।
प्रभाव
1. पर्यावरणीय लाभ – पुनःडिज़ाइन से इलेक्ट्रॉनिक कचरे में कमी आएगी, जिससे मिट्टी, जल और वायु प्रदूषण में भी कमी होगी।
2. आर्थिक लाभ – मूल्यवान धातु और घटकों की पुनःप्राप्ति से उत्पादन लागत घटेगी और नई नौकरियाँ सृजित होंगी।
3. सुरक्षा – पुनर्चक्रण के दौरान विषैले रसायनों के रिसाव को नियंत्रित करके स्वास्थ्य जोखिमों को न्यूनतम किया जा सकेगा।
4. सामाजिक प्रभाव – ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में स्मार्ट चिकित्सा उपकरणों का पुनःउपयोग स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच बढ़ाने में सहायक होगा।
निष्कर्ष
स्मार्ट चिकित्सा उपकरणों का पुनःडिज़ाइन एक तात्कालिक आवश्यकता है, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। शोध के निष्कर्षों के आधार पर, नीति निर्माताओं, उद्योग जगत और स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं को मिलकर ऐसे उपकरणों के निर्माण में मॉड्यूलरिटी, पुनःउपयोग और पुनर्चक्रण को प्रमुख मानदंड बनाना चाहिए। यदि इस दिशा में ठोस कदम उठाए जाएँ, तो न केवल इलेक्ट्रॉनिक कचरे की बढ़ती समस्या को नियंत्रित किया जा सकेगा, बल्कि स्वास्थ्य क्षेत्र में भी स्थायी विकास की राह प्रशस्त होगी।
